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सिहावा थाना परिसर में  9 दिनों के चैत्र नवरात्रि के दौरान, तैनात पुलिसकर्मी अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी और अध्यात्म के बीच एक ऐसा संतुलन बिठाते हैं, जो किसी मिसाल से कम नहीं।

यशवंत गंजीर- कुरुद। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का एक ऐसा इलाका, जहाँ अपराधियों के मन में खौफ होना चाहिए, वहां आज हवाओं में कपूर और हवन की खुशबू तैर रही है। यह कोई साधारण मंदिर नहीं, बल्कि सिहावा थाना परिसर है, जहाँ कानून के रखवाले ही 'आस्था के रक्षक' बन चुके हैं। हमने जब इसकी तहकीकात की, तो वर्दी के पीछे छिपी अटूट श्रद्धा की एक ऐसी कहानी सामने आई, जो ब्रिटिश काल के पन्नों से जुड़ी है।

वर्दी और भक्ति का 'डबल ड्यूटी' कनेक्शन
आमतौर पर पुलिस थानों में फरियादियों की भीड़ और संगीन जुर्मों की चर्चा होती है, लेकिन सिहावा थाने का नजारा बिल्कुल उलट है। यहाँ बंदूक थामने वाले हाथ सुबह-शाम मां खंभेश्वरी देवी की आरती उतारते हैं। 9 दिनों के चैत्र नवरात्रि उत्सव के दौरान, यहाँ तैनात पुलिसकर्मी अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी और अध्यात्म के बीच एक ऐसा संतुलन बिठाते हैं, जो किसी मिसाल से कम नहीं। 

A feast for girls was organised at the police station.
थाने में कन्या भोज का किया गया आयोजन 

इतिहास की फाइलों से निकला रहस्य 
हमारी पड़ताल में एक दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य सामने आया। बात साल 1898 की है, जब सिहावा क्षेत्र से रेलवे स्लीपरों के लिए बेशकीमती साल की लकड़ियों की तस्करी रोकने के लिए अंग्रेजों ने यहाँ थाना बनाने का फैसला किया। ​हैरान करने वाली बात है कि, उस दौर के अंग्रेज अफसरों ने भी स्थानीय लोगों की आस्था के आगे सर झुकाया। ​जब 1903 में थाना भवन का निर्माण हुआ, तो मंदिर के अस्तित्व को छेड़ा नहीं गया। आज 128 साल बाद भी, वह प्राचीन मंदिर सुरक्षित है और पुलिसकर्मी ही इसके 'मुख्य सेवादार' हैं।

महाअष्टमी के दिन 'सिंघम' बने सेवादार
​इस बार की महाअष्टमी पर यहाँ जो दिखा, उसने सबका दिल जीत लिया। कड़क वर्दी पहने अफसरों ने न केवल हवन कुंड में आहुतियां दीं, बल्कि नव-कन्याओं के पैर पखारकर उन्हें भोजन कराया। पुलिसकर्मियों का कहना है कि यह भक्ति ही उन्हें कठिन ड्यूटी के दौरान मानसिक शांति और शक्ति प्रदान करती है।

आस्था का 'सुरक्षा चक्र'
​क्षेत्र की सुख-शांति के लिए पुलिसकर्मियों द्वारा किया जाने वाला यह आयोजन अब एक परंपरा बन चुका है। सिहावा थाना आज केवल एक सरकारी दफ्तर नहीं, बल्कि भक्ति, इतिहास और कर्तव्य का एक ऐसा संगम है, जिसे देखना अपने आप में एक अनोखा अनुभव है।

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