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धार भोजशाला परिसर पर ASI की 100 दिन की सर्वे रिपोर्ट कोर्ट में पेश। संस्कृत-प्राकृत और अरबी-फारसी शिलालेख मिले। सभी पक्षों से 2 सप्ताह में आपत्तियां मांगी गईं।

इंदौर। धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर चल रहे विवाद के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा तैयार सर्वे रिपोर्ट अब न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन चुकी है। इंदौर खंडपीठ में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी पक्षों को निर्देश दिया है कि वे इस रिपोर्ट पर दो सप्ताह के भीतर अपनी आपत्तियां और सुझाव प्रस्तुत करें।

अगली सुनवाई में इन्हीं प्रतिक्रियाओं के आधार पर आगे की दिशा तय की जाएगी। एएसआई ने यह सर्वे हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू किया था। जांच का दायरा केवल मुख्य परिसर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके चारों ओर 50 मीटर की परिधि को भी अध्ययन में शामिल किया गया। 

एएसआई टीम ने किया विस्तृत सर्वेक्षण
मार्च 2024 से शुरू हुई यह प्रक्रिया लगभग 100 दिनों तक चली। इस दौरान पुरातत्वविदों, अभिलेख विशेषज्ञों, रसायनविदों और तकनीकी कर्मचारियों की टीम ने स्थल का विस्तृत निरीक्षण, दस्तावेजीकरण और सीमित उत्खनन किया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि परिसर से 12वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक के विभिन्न कालखंडों के शिलालेख और स्थापत्य अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के साथ नागरी लिपि के लेख मिले हैं, वहीं कुछ अभिलेख अरबी और फारसी में भी पाए गए। 

संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिले 
सर्वे में संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों में कुछ साहित्यिक कृतियों का उल्लेख मिलता है, जिनका संबंध परमार काल से जोड़ा जाता है। एक बड़े अभिलेख में पारिजातमंजरी नामक नाटिका का जिक्र है, जिसे परमार शासक अर्जुनवर्मन के गुरु मदन द्वारा रचित बताया गया है। प्रस्तावना में यह भी उल्लेख है कि इसका मंचन देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर में हुआ था। एक अन्य अभिलेख में अवनिकर्मसातम नामक काव्य का संदर्भ मिलता है, जिसे परंपरा के अनुसार भोजदेव से जोड़ा जाता है। 

बाद में अरबी-फारसी शिलालेख भी दिखे
इसके अलावा, बाद के कालखंडों के अरबी-फारसी शिलालेख यह दिखाते हैं कि बाद के समय में मुस्लिम शासनकाल में यहां की स्थिति बदली और इस स्थान का प्रयोग अन्य प्रयोजन में होने लगा। फारसी के लेख इस बात का प्रमाण देते हैं। सर्वे में मिले शुरुआती प्रमाणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह स्थान हिंदुओं से संबंधित था और मंदिर था। यहां मिले प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि पारिजातमंजरी नामक नाटिका की प्रस्तावना में जिस सरस्वती मंदिर का जिक्र किया गया है, वह यही भोजशाला है। जिस पर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम पक्ष दावा करते रहे हैं। 

अदालत करेगी दावों और आपत्तियों पर विचार
एएसआई की रिपोर्ट केअनुसार यहां अरबी-फारसी के शिलालेखों समेत कई अन्य प्रमाण भी मिले हैं, जो इस स्थान को मुस्लिम समुदाय से भी जोड़ते हैं। लेकिन यह कालखंड तुलनात्मक रूप से बाद का है।  एसआई रिपोर्ट में मिले प्रमाण यह संकेत देते हैं कि भोजशाला परिसर बहुस्तरीय ऐतिहासिक परंपराओं का साक्षी रहा है।

अब अदालत में सभी पक्षों द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों और सुझावों पर विचार किया जाएगा। इस रिपोर्ट का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह स्थल की ऐतिहासिक प्रकृति और उसके उपयोग के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालती है। अंतिम निर्णय न्यायालय के समक्ष उपलब्ध तथ्यों और दलीलों के आधार पर ही लिया जाएगा।

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