पंकज गुप्ते- बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जमीन विवाद से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि सिर्फ मौखिक समझौते के आधार पर जमीन की बिक्री का दावा मान्य नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत के ऐसे दावे कानून की कसौटी पर नहीं टिकते और इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के 24 अक्टूबर 2018 के फैसले को पलट दिया गया।
दरअसल, इस मामले में प्रभुनाथ सिंह ने दावा किया था कि उसने और आरोपी ने मिलकर लोगों से करीब 1.15 करोड़ रुपये एकत्र कर जमीन खरीदी थी और बाद में 1 सितंबर 2012 को 40 लाख रुपये में जमीन बेचने का मौखिक समझौता हुआ था, जिसके तहत उसने 16 लाख रुपये अग्रिम भी दिए।
साथ ही उसने जमीन पर निर्माण कार्य और कब्जे का भी दावा किया। ट्रायल कोर्ट ने इन दावों को स्वीकार करते हुए उसके पक्ष में डिक्री पारित कर दी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि कथित मौखिक समझौते का कोई स्पष्ट और विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। जिन गवाहों के सामने समझौता होने की बात कही गई थी, उन्होंने भी इसकी पुष्टि नहीं की।
भुगतान की समयरेखा और अन्य जरूरी तथ्य नहीं हुए साबित
कोर्ट ने यह भी माना कि समझौते की शर्तें, भुगतान की समयरेखा और अन्य जरूरी तथ्य स्पष्ट रूप से साबित नहीं हुए, जिससे ऐसा कोई वैध अनुबंध सिद्ध नहीं होता। अदालत ने यह भी कहा कि जमीन की रजिस्ट्री आरोपी के नाम पर हुई थी और यह साबित नहीं हो पाया कि भुगतान वास्तव में अन्य लोगों द्वारा किया गया था। ऐसे में बेनामी लेनदेन अधिनियम, 1988 के तहत भी वादी का दावा टिक नहीं सकता।
कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा वादी के हित को मान्यता देना कानून के विपरीत था। इसके अलावा मामले में वाद पत्र में कथित हेरफेर (इंटरपोलेशन) के आरोप भी सामने आए, लेकिन हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और संयुक्त विशेषज्ञ समिति दोनों ही स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दे सके।
कोर्ट ने कार्रवाई की मांग याचिका को किया खारिज
हाईकोर्ट ने संबंधित विवादित पंक्ति को हटाने की अनुमति तो दी, लेकिन आपराधिक कार्रवाई की मांग को खारिज कर दिया। अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक दावों के आधार पर जमीन के स्वामित्व या बिक्री के अधिकार नहीं दिए जा सकते और ठोस साक्ष्य आवश्यक हैं। इसी आधार पर अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का आदेश निरस्त कर दिया गया।










