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हाई कोर्ट ने एक ही विषय में तीन बार फेल होने वाले प्रशिक्षुओं को चौथा मौका देने से मना कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को योग्य शिक्षकों द्वारा शिक्षा दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है।

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed) के उन हजारों अभ्यर्थियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है जो एक ही विषय में तीन बार फेल होने के बाद चौथे अवसर की मांग कर रहे थे। कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि शिक्षा की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने दो टूक कहा कि जो अभ्यर्थी खुद अपनी परीक्षा पास करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

​तीन बार फेल होने वालों को नहीं मिलेगा चौथा मौका

​हाई कोर्ट ने उन अभ्यर्थियों को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है जो विशेष अनुमति के तहत चौथे अवसर की मांग लेकर अदालत पहुँचे थे। कोर्ट ने राज्य सरकार की स्पेशल अपील को स्वीकार करते हुए एकल पीठ के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें फेल छात्रों को दोबारा परीक्षा में बैठने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "मासूम बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। हम उन बच्चों का भविष्य उन फिसड्डी शिक्षकों के हवाले नहीं कर सकते जो खुद को साबित करने में बार-बार नाकाम रहे हैं।"

​समानता के आधार पर अवैध लाभ की मांग अनुचित

​सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी ने 2021 और 2022 में कुछ छात्रों को नियमों के विरुद्ध जाकर विशेष अवसर प्रदान किए थे। इसी का हवाला देते हुए सैकड़ों अन्य छात्रों ने भी समानता के अधिकार के तहत चौथे मौके की मांग की थी।

इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि पूर्व में अधिकारियों ने किसी को नियमों के विरुद्ध जाकर अवैध लाभ दिया है, तो अन्य छात्र उसी गलती को दोहराने की मांग नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि समानता का अधिकार केवल कानूनी और वैध कार्यों के लिए होता है, अवैध कार्यों को दोहराने के लिए नहीं।

​राज्य सरकार की दलील

​राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि डीएलएड प्रशिक्षुओं को पहले ही पर्याप्त अवसर दिए जा चुके थे। सरकार ने स्पष्ट किया कि सचिव के पास नियमों को शिथिल करने या उन्हें बदलने की कोई कानूनी शक्ति नहीं है।

किसी भी सरकारी आदेश के जरिए उन वैधानिक नियमों को नहीं बदला जा सकता जो केंद्र और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा निर्धारित किए गए हैं। कोर्ट ने सरकार की इस बात को स्वीकार किया कि नियम विरुद्ध दिए गए पिछले मौकों को आधार बनाकर नए अधिकारों की मांग करना वैधानिक रूप से गलत है।

​एनसीटीई (NCTE) के नियम सर्वोपरि

​कोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि एनसीटीई के नियम राज्य के किसी भी कार्यकारी आदेश से ऊपर हैं। नियमों के मुताबिक, दो साल का यह डीएलएड कोर्स अधिकतम तीन साल के भीतर पूरा होना अनिवार्य है। सचिव के पास इस समय सीमा को बढ़ाने या बार-बार फेल होने वाले प्रशिक्षुओं को अतिरिक्त मौका देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने साफ किया कि अगर बार-बार फेल होने वाले अभ्यर्थियों को शिक्षक बनने का मौका दिया गया, तो यह उन छात्रों के भविष्य के साथ बड़ा अन्याय होगा जिन्हें ये आगे चलकर सरकारी स्कूलों में पढ़ाएंगे।

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