नई दिल्ली : ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु ने इस्लामिक रिपब्लिक के भीतर एक बड़ा नेतृत्व संकट पैदा कर दिया है। इस समय पूरी दुनिया की नजरें दो प्रमुख चेहरों—हसन खुमैनी और मोजतबा खामेनेई पर टिकी हैं। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या ईरान अपनी कट्टरपंथी छवि को बरकरार रखेगा या उदारवाद की ओर कदम बढ़ाएगा।
कौन हैं हसन खुमैनी: विरासत और उदारवादी पहचान
53 वर्षीय हसन खुमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के पोते हैं। हालांकि वे एक धार्मिक विद्वान हैं, लेकिन उन्होंने अब तक कोई आधिकारिक सरकारी पद नहीं संभाला है और फिलहाल तेहरान में अपने दादा की दरगाह के संरक्षक हैं।
उन्हें सुधारवादी खेमे का करीबी माना जाता है और वे संगीत, महिलाओं के अधिकार और सामाजिक आजादी जैसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत उदार विचार रखते हैं। हसन खुमैनी की सबसे बड़ी ताकत उनका 'खुमैनी' खानदान होना है, जो उन्हें जनता के एक बड़े वर्ग और सुधारवादियों के बीच लोकप्रिय बनाता है।
कौन हैं मोजतबा खामेनेई: सत्ता के केंद्र में रहने वाले कट्टरपंथी
अयातुल्ला खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान की कट्टरपंथी धार्मिक और सैन्य व्यवस्था का सबसे भरोसेमंद चेहरा माना जाता है। वे अक्सर पर्दे के पीछे से काम करते रहे हैं, लेकिन उनका इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और देश के सुरक्षा तंत्र पर गहरा नियंत्रण है।
मोजतबा को पिछले कई सालों से विशेष रूप से लीडरशिप के लिए तैयार किया गया है और उन पर चुनावों के नतीजों को प्रभावित करने के आरोप भी लगते रहे हैं। उनकी दावेदारी को कट्टरपंथी गुटों का भारी समर्थन प्राप्त है, लेकिन उनकी नियुक्ति से देश में असंतोष भड़कने का खतरा भी बताया जा रहा है।
'फॉरवर्ड-थिंकिंग' मौलवी: संगीत और महिलाओं के अधिकार पर रुख
हसन खुमैनी को एक "फॉरवर्ड-थिंकिंग" मौलवी माना जाता है, जिनकी रुचि पश्चिमी फिलॉसफी में भी काफी अधिक है। उन्होंने कई बार सामाजिक आजादी और पारदर्शिता की वकालत की है, जिससे वे युवाओं के बीच एक प्रभावी चेहरा बनकर उभरे हैं। वे अरबी और अंग्रेजी भाषा के जानकार हैं और अपनी युवावस्था में फुटबॉल के शौकीन भी रहे हैं।
पारदर्शिता की मांग और महसा अमीनी मामले पर कड़ा स्टैंड
हसन खुमैनी ने समय-समय पर ईरानी व्यवस्था की कमियों पर खुलकर अपनी राय रखी है। साल 2022 में महसा अमीनी की मौत के बाद उन्होंने पारदर्शिता की मांग करते हुए कहा था कि जनता को सच्चाई बताई जानी चाहिए। उन्होंने गार्जियन काउंसिल द्वारा सुधारवादी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने की भी कड़ी आलोचना की थी, हालांकि वे कभी सीधे तौर पर पूरे सिस्टम के खिलाफ विद्रोह नहीं करते।
पश्चिम और इजराइल के प्रति कूटनीतिक दृष्टिकोण
हसन खुमैनी का रुख इजराइल के प्रति काफी सख्त है, उन्होंने इसे “जायोनी शासन” और “कैंसर जैसी बीमारी” करार दिया है। हालांकि, अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर वे टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता चुनने के पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि प्रतिबंधों के कारण आम ईरानी नागरिकों को भारी आर्थिक क्षति हुई है, इसलिए बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाना चाहिए।
'असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स' और चयन की कठिन प्रक्रिया
ईरान के सुप्रीम लीडर का चुनाव 'असेम्बली ऑफ एक्सपर्ट्स' के 88 सदस्यों द्वारा किया जाता है, जो मुख्य रूप से वरिष्ठ मौलवी होते हैं। यह संस्था बंद कमरे में बैठक कर धार्मिक पहचान और वफादारी के आधार पर अगले उत्तराधिकारी का फैसला लेती है। हसन खुमैनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती गार्जियन काउंसिल से मंजूरी पाना है, जिसने 2016 में उनकी धार्मिक योग्यता को कम बताते हुए उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी थी।
IRGC: पर्दे के पीछे की सबसे बड़ी सैन्य और राजनीतिक ताकत
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ईरान की वह ताकत है जिसका समर्थन किसी भी उत्तराधिकारी के लिए अनिवार्य है। IRGC का नेतृत्व तंत्र फिलहाल मोजतबा खामेनेई के प्रति अधिक वफादार माना जाता है। यदि IRGC के भीतर कोई बंटवारा होता है, तो यह नेतृत्व चयन की प्रक्रिया में बड़ी गड़बड़ी और अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
विरासत बनाम वफादारी: ईरान का आंतरिक संघर्ष
ईरान इस समय बाहरी दबाव और अंदरूनी असंतोष दोनों का सामना कर रहा है। हसन खुमैनी के पास जहां दादा की महान विरासत है, वहीं मोजतबा के पास वर्तमान सिस्टम और सेना की ताकत है। यह संघर्ष केवल एक पद का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि ईरान कट्टरपंथ के रास्ते पर आगे बढ़ेगा या बातचीत और सुधारों की नई दिशा चुनेगा।
भविष्य की चुनौतियां और वैश्विक प्रभाव
नया सुप्रीम लीडर कौन होगा, यह केवल ईरान का आंतरिक मामला नहीं है बल्कि इसका वैश्विक कूटनीति पर भी गहरा असर पड़ेगा। हसन खुमैनी का चयन होने पर पश्चिम के साथ संबंधों में नरमी की उम्मीद की जा सकती है, जबकि मोजतबा के आने से टकराव और बढ़ने की आशंका है। आने वाले कुछ दिन ईरान की भावी दिशा और क्षेत्रीय शांति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे।