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इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में कथित दूषित पानी से हुई 35 मौतों को लेकर विधानसभा में तीखा टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, तो पोस्टमार्टम केवल एक का ही क्यों हुआ? सरकार इस पर बचाव करती दिखी।

भोपाल। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में कथित रूप से दूषित पानी पीने के बाद हुई 35 लोगों की मौतों के मामले में विधानसभा घमासान शुरू हो गया है। विपक्ष के लिए यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है और इस पर पिछले दो दिनों से इस पर तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है। विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि मामले को अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है।

विधानसभा अध्यक्ष द्वारा स्थगन प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने के बाद भी विपक्ष का विरोध थमा नहीं है। विपक्ष का कहना है कि जिन 35 लोगों की जान गई, उनमें से केवल एक व्यक्ति का ही पोस्टमॉर्टम कराया गया। शेष 34 मृतकों का अंतिम संस्कार बिना चिकित्सकीय परीक्षण के कर दिया गया। 

विपक्ष का सवाल-कैसे तय होगा मौत का कारण
इससे यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर मौत का वास्तविक कारण आधिकारिक रूप से कैसे तय किया जाएगा। जिस एक युवक का पोस्टमॉर्टम हुआ, उसकी रिपोर्ट में भी फोरेंसिक विशेषज्ञ ने स्पष्ट रूप से मृत्यु का कारण दर्ज नहीं किया। यानी मेडिकल दस्तावेज भी यह निर्णायक रूप से नहीं बता पा रहे कि मौत दूषित जल के कारण हुई या किसी अन्य वजह से।

बताया गया कि युवक को 31 दिसंबर को उल्टी और दस्त की शिकायत हुई थी। पहले उसे एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां हालत गंभीर बताई गई। बाद में उसे एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। 

सीएम बोले हर मामले में पोस्टमार्टम संभव नहीं
परिजनों का दावा है कि वह भागीरथपुरा क्षेत्र में काम के दौरान खराब पानी पीने से बीमार पड़ा था। हालांकि आधिकारिक रिपोर्ट में इस दावे की पुष्टि नहीं हो सकी है। विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान पोस्टमॉर्टम को लेकर खासा विवाद हुआ। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि हर मृत्यु के मामले में पोस्टमॉर्टम कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता।

वहीं विपक्ष का तर्क है कि जब इतनी बड़ी संख्या में मौतें हुई हैं और कारण संदिग्ध है, तो वैज्ञानिक जांच जरूरी थी। विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि अगर सरकार इन मौतों को सामान्य मान रही है, तो फिर अलग-अलग मुआवजा राशि क्यों दी जा रही है। अन्य मामलों में चार लाख रुपये दिए जाते हैं, जबकि यहां दो लाख रुपये की सहायता दी गई।

प्रकरण दो माह से प्रमुख चर्चाओं में शामिल 
यह पूरा प्रकरण दो महीने से अधिक समय से चर्चा में है और समय बीतने के साथ सवाल और गहरे होते जा रहे हैं। बिना स्पष्ट चिकित्सकीय प्रमाण के यह सिद्ध करना कठिन होगा कि सभी मौतें एक ही कारण से हुईं। यदि जांच प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हुई तो पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने में भी बाधा आ सकती है।

इस घटना ने प्रशासनिक सतर्कता, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। कुल मिलाकर, मामला अब केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि शासन की जवाबदेही और राजनीतिक पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। 

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