भोपाल। साल 2025 की भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में मध्य प्रेदश लोक सेवा आयोग (MP PSC) की कार्यप्रणाली से जुड़ी कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। राज्य सरकार ने इस रिपोर्ट को विधानसभा में पेश किया है। रिपोर्ट में विभिन्न विभागों के ऑडिट के दौरान पाई गई गड़बड़ियों का विस्तार से विवरण दिया गया है। रिपोर्ट में भर्ती प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब, प्रशासनिक ढिलाई और वित्तीय प्रबंधन में कमी को लेकर आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए गए हैं।
परीक्षा-चयन प्रक्रिया में हो रही गैरजरूरी देरी
रिपोर्ट के अनुसार जिन परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को एक महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए था, उन्हें समाप्त करने में औसतन 136 दिन का समय लग गया। यह देरी सामान्य परिस्थितियों से कहीं अधिक है। जांच में यह सामने आया कि आयोग और संबंधित विभागों के बीच समुचित तालमेल का अभाव था। कई विभागों ने रिक्त पदों की जानकारी समय पर नहीं भेजी, जिससे पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई। इसका प्रभाव उन युवाओं पर पड़ा, जो सरकारी नौकरियों का इंतजार कर रहे थे।
44 में 28 परीक्षा के लिए जारी किए विज्ञापन
कैग ने 2018-19 से 2022-23 तक की अवधि के दस्तावेजों की नमूना जांच की। इस दौरान यह पाया गया कि 2018 से 2023 के बीच आयोजित 44 परीक्षाओं में से केवल 28 के लिए ही विज्ञापन जारी किए गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि योजना निर्माण और क्रियान्वयन में गंभीर कमियां थीं। इतना ही नहीं, कुल 94 प्रस्तावित विज्ञापनों में से 30 विज्ञापनों को जारी करने में निर्धारित समय सीमा से बहुत अधिक, औसतन 136 दिन की अतिरिक्त देरी हुई। इससे अभ्यर्थी परेशान हुए।
परीक्षा आयोजन प्रणाली पर भी उठाए सवाल
रिपोर्ट में परीक्षा आयोजन प्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। कुल 19 परीक्षाओं में से मात्र पांच को ऑनलाइन माध्यम से आयोजित किया गया। आयोग ने वर्ष 2013 के बाद अपनी नियमावली में कोई महत्वपूर्ण संशोधन नहीं किया, जिसके कारण सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश शामिल नहीं हो सके। इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली प्रभावित हुई और जरूरत के हिसाब से सुधार नहीं हो पाए। वित्तीय मामलों में भी लापरवाही देखी गई। उपलब्ध बजट का 42 प्रतिशत हिस्सा वापस कर दिया गया।
वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी
रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 से 2023 के बीच लगभग 51.18 करोड़ रुपए की राशि में से करीब 5 करोड़ रुपए के उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए गए। यह स्थिति वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठाती है। मानव संसाधन की स्थिति भी संतोषजनक नहीं रही। आयोग में 21 से 24 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए, जिन्हें अस्थायी या संविदा कर्मचारियों से भरा गया। साथ ही, कई अभ्यर्थियों को चार वर्ष बाद भी परीक्षा शुल्क वापस नहीं किया गया।








