Historical Heritage: गाजियाबाद के मसूरी इलाके में स्थित 'पीली कोठी' एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत है जो 1864 से खड़ी है। यह ब्रिटिश युग की याद दिलाती है और ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से बनवाई गई थी। इस कोठी को ब्रिटिश इंजीनियर जॉन माइकल्स के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया था, जो उस समय के महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों में शामिल थे। आज यह इमारत न सिर्फ इतिहास की गवाह है, बल्कि अपनी भव्यता के कारण लोगों को आकर्षित करती है। इसकी दीवारें पुराने समय की कहानियां सुनाती हैं, जहां अंग्रेजी शासन की छाप साफ दिखाई देती है। यह जगह अब भी वैसी ही बनी हुई है, जैसे उस समय थी, और इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। इस कोठी की लोकप्रियता अब फिल्म इंडस्ट्री तक पहुंच गई है, जहां यह शूटिंग के लिए इस्तेमाल होती है। कुल मिलाकर, यह एक ऐसी संपत्ति है जो अतीत और वर्तमान को जोड़ती है।
निर्माण का इतिहास
'पीली कोठी' का निर्माण 1864 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने करवाया था। यह फैसला ब्रिटिश इंजीनियर जॉन माइकल्स के सम्मान में लिया गया, जिन्होंने कंपनी के लिए महत्वपूर्ण काम किए थे। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन मजबूत हो रहा था, और ऐसे इंजीनियरों को पुरस्कृत करने का चलन था। कोठी को बनाने का मुख्य उद्देश्य जॉन माइकल्स को एक आरामदायक आवास प्रदान करना था, जहां वे अपने परिवार के साथ रह सकें। निर्माण में उस दौर की उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया गया, जो आज भी मजबूती से टिकी हुई हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस इमारत को बनाने के लिए स्थानीय संसाधनों के साथ-साथ विदेशी सामग्री भी मंगवाई। यह कोठी ब्रिटिश वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें यूरोपीय शैली की झलक मिलती है। समय के साथ यह इमारत कई हाथों से होकर गुजरी, लेकिन इसका मूल स्वरूप बरकरार रहा। आज यह हमें उस युग की याद दिलाती है जब ब्रिटिश कंपनी भारत में अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी।
भव्यता और मजबूती
यह चार मंजिला इमारत लगभग 3000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसमें कुल 40 कमरे हैं, जो उस समय के उच्च स्तर के जीवन को दर्शाते हैं। कोठी में बेल्जियम से मंगाए गए शीशे लगे हैं, जो आज भी चमकदार और सुरक्षित हैं। इन शीशों की खासियत यह है कि वे प्रकाश को खूबसूरती से प्रतिबिंबित करते हैं, जिससे पूरा घर रोशन लगता है। साथ ही, सागौन की लकड़ी से बने फर्नीचर और दरवाजे-खिड़कियां अब भी मजबूत हैं। सागौन की लकड़ी अपनी टिकाऊपन के लिए जानी जाती है, और यह यहां की जलवायु में बिना खराब हुए टिकी हुई है। इमारत की दीवारें मोटी हैं, जो गर्मी और सर्दी दोनों से बचाती हैं। ऊपरी मंजिलों से आसपास के इलाकों का सुंदर नजारा दिखता है। कुल मिलाकर, इसकी डिजाइन ऐसी है कि यह लग्जरी और उपयोगिता दोनों को ध्यान में रखकर बनाई गई। आज भी पर्यटक और इतिहास प्रेमी इसकी वास्तुकला की तारीफ करते हैं।
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जागीर और पुरस्कार
'पीली कोठी' कभी 12 गांवों की जागीर का हिस्सा थी। ब्रिटिश सरकार ने जॉन माइकल्स के योगदान से प्रभावित होकर उन्हें यह इनाम दिया था। उस समय ऐसे पुरस्कार आम थे, जहां योग्य अधिकारियों को जमीन और संपत्ति दी जाती थी। यह जागीर आसपास के ग्रामीण इलाकों को कवर करती थी, और कोठी इसका केंद्र बनी। इससे जॉन माइकल्स को आर्थिक सुरक्षा मिली, और वे यहां लंबे समय तक रहे। यह इमारत 1857 की क्रांति के बाद के दौर की गवाह है, जब ब्रिटिश शासन ने अपनी स्थिति मजबूत की। जागीर का प्रबंधन स्थानीय लोगों के हाथों भी रहा, जिससे यह इलाका विकसित हुआ। समय के साथ स्वतंत्रता के बाद जागीर व्यवस्था खत्म हो गई, लेकिन कोठी का महत्व बना रहा। यह हमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीतियों की याद दिलाती है, जहां व्यक्तिगत योगदान को बड़े इनामों से सम्मानित किया जाता था।
वर्तमान स्थिति
आज 'पीली कोठी' एक निजी संपत्ति है, जो किसी परिवार के कब्जे में है। स्वतंत्रता के बाद यह सरकारी हाथों से निकलकर निजी मालिकाना हक में आई। मालिकों ने इसे संरक्षित रखा है, ताकि इसकी ऐतिहासिक मूल्य कम न हो। हालांकि, रखरखाव की चुनौतियां हैं, क्योंकि पुरानी इमारतों को बनाए रखना महंगा पड़ता है। फिर भी, इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया, और मूल विशेषताएं बरकरार हैं। यह जगह अब पर्यटन के लिए खुली नहीं है, लेकिन विशेष अनुमति से देखी जा सकती है। स्थानीय लोग इसे सम्मान की नजर से देखते हैं, और यह इलाके की पहचान बनी हुई है। निजी संपत्ति होने के कारण इसका व्यावसायिक इस्तेमाल सीमित है, लेकिन यह अब भी सुरक्षित और मजबूत खड़ी है। भविष्य में इसे हेरिटेज साइट बनाने की मांग उठ सकती है।
फिल्मों की होती है शूटिंग
'पीली कोठी' अब बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर हो गई है। यहां 'रन' और 'दिल्ली क्राइम' जैसी फिल्मों और सीरीज की शूटिंग हुई है। इसकी पुरानी और भव्य लुक फिल्ममेकर्स को आकर्षित करती है, जो पुराने समय की कहानियों के लिए परफेक्ट बैकड्रॉप प्रदान करती है। कोठी की दीवारें और कमरे कैमरे के सामने जीवंत हो उठते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचा है, क्योंकि शूटिंग के दौरान क्रू और कलाकार यहां आते हैं। यह जगह अब सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि स्क्रीन पर भी नजर आती है। फिल्म इंडस्ट्री ने इसे नई पहचान दी है, जो युवा पीढ़ी को इसके बारे में जानने के लिए प्रेरित करती है। कुल मिलाकर, यह कोठी अतीत की विरासत को वर्तमान की चकाचौंध से जोड़ रही है।