West Bengal Election: पश्चिम बंगाल (West Bengal) में रामनवमी (Ram Navami 2026) अब सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं रहा, बल्कि यह चुनावी शक्ति प्रदर्शन का बड़ा मंच बन चुका है। राज्य भर में 20,000 से ज्यादा शोभायात्राओं के बीच BJP और TMC आमने-सामने हैं, जिससे राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है।
भारतीय जनता पार्टी और विभिन्न हिंदू संगठन इस मौके पर 5 दिनों तक भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहे हैं। बीजेपी इस बार रामनवमी के मंच से बांग्लादेश और बंगाल के विभिन्न जिलों जैसे मुर्शिदाबाद और आसनसोल में हिंदुओं पर हुए कथित अत्याचारों और हत्याओं के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है।
Security Alert: Asansol और Howrah में हाई अलर्ट, सख्त बंदिशें
रामनवमी की तैयारियों के बीच कानून-व्यवस्था को लेकर सुरक्षा एजेंसियां बेहद सतर्क हैं। विशेष रूप से आसनसोल और हावड़ा जैसे इलाकों पर नजर रखी जा रही है, जहाँ 2018 और 2019 में रामनवमी के दौरान हिंसक झड़पें और आगजनी हुई थी।
कोलकाता हाईकोर्ट ने इस बार भी हावड़ा में रामनवमी जुलूस की अनुमति तो दी है, लेकिन हथियारों के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट ने 'अंजनी पुत्र सेना' जैसे संगठनों को 26 मार्च की सुबह एक निश्चित समय सीमा के भीतर जुलूस निकालने की अनुमति दी है।
पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी व्यक्ति कानून हाथ में लेगा या हथियारों का प्रदर्शन करेगा, तो उसके खिलाफ तत्काल सख्त कार्रवाई की जाएगी।
Weapons Row: हथियारों के प्रदर्शन पर BJP vs प्रशासन टकराव
पुरुलिया और अन्य हिंदू बहुल इलाकों में हथियारों के प्रदर्शन को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। बीजेपी के स्थानीय संयोजकों का कहना है कि उनके सभी अखाड़े रजिस्टर्ड हैं और चूंकि हिंदू देवी-देवता शस्त्र धारण करते हैं, इसलिए वे हथियारों के साथ ही रैली निकालेंगे।
दूसरी ओर, मालदा जैसे जिलों में 52 से अधिक संगठनों ने मिलकर 5 किलोमीटर लंबी भव्य रैली निकालने का निर्णय लिया है। मालदा में बीजेपी की उपाध्यक्ष तंद्रा राय चौधरी ने बताया कि इस बार भीड़ पिछले साल के रिकॉर्ड को तोड़ देगी। दिलचस्प बात यह है कि अब रैलियों की परमिशन की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन हो गई है, जिससे विवाद की गुंजाइश कम करने की कोशिश की गई है।
TMC Strategy: ‘Soft Hindutva’ और अस्त्रहीन संकीर्तन रैली
बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति बदल दी है। टीएमसी के पार्षद और नेता अब सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि "जय श्री राम" कहने से राम सिर्फ बीजेपी के नहीं हो जाते, वे सबके हैं। हुगली जैसे जिलों में टीएमसी 'अस्त्रहीन संकीर्तन रैली' निकालने की तैयारी कर रही है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि वे हिंदू विरोधी नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी के स्थानीय नेता इस बार अपनी हिंदू पहचान को बचाने के लिए इन रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। आसनसोल और दुर्गापुर जैसे क्षेत्रों में टीएमसी कार्यकर्ता खुद अखाड़ों का नेतृत्व कर रहे हैं ताकि वोट बैंक का ध्रुवीकरण रोका जा सके।
Political Background: 2018 दंगों के बाद बदला बंगाल का समीकरण
पश्चिम बंगाल में पिछले 10 सालों में रामनवमी का क्रेज अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा है। सीनियर जर्नलिस्ट्स के मुताबिक, लेफ्ट के शासनकाल में भी आरएसएस के लोग जुलूस निकालते थे, लेकिन तब इसका राजनीतिकरण नहीं हुआ था। 2018 के रानीगंज और आसनसोल दंगों के बाद बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया, जिससे ध्रुवीकरण तेज हुआ।
इसका सीधा लाभ 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को मिला, जहाँ उसकी सीटें 2 से बढ़कर 18 हो गईं। इस बार भी नॉर्थ बंगाल के 8 जिलों में 150 से ज्यादा जुलूस निकलने की उम्मीद है, जिसमें 35 लाख से ज्यादा लोग शामिल हो सकते हैं। साध्वी प्राची जैसे फायरब्रांड नेताओं की मौजूदगी इन रैलियों के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकती है।










