नई दिल्ली. वैश्विक शेयर बाजार में भारत की हिस्सेदारी चार साल में पहली बार 3 प्रतिशत से नीचे फिसल गई। 30 मार्च तक यह घटकर 2.98% रह गई, जो फरवरी 2022 के बाद सबसे निचला स्तर है। जुलाई 2024 में यह हिस्सेदारी 4.57 फीसदी के शिखर पर थी, लेकिन उसके बाद से लगातार गिरावट देखी जा रही।
आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2024 के अंत तक भारत की हिस्सेदारी करीब 4.2 प्रतिशत थी, जो दिसंबर 2025 तक घटकर 3.5 फीसदी रह गई। अब मार्च 2026 के अंत में यह और नीचे आ गई। इस गिरावट के पीछे कई बड़े कारण हैं, जिनमें विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक अनिश्चितता शामिल हैं।
बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप घटा
बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 30 मार्च तक घटकर करीब 4.36 ट्रिलियन डॉलर रह गया। यह दिसंबर 2025 के 5.3 ट्रिलियन डॉलर से करीब 15 प्रतिशत कम है, जबकि सितंबर 2024 के रिकॉर्ड 5.66 ट्रिलियन डॉलर से लगभग 23 प्रतिशत नीचे है।
मार्च में विदेशी निवेशकों ने 12 अरब डॉलर से ज्यादा की बिकवाली की
मार्च महीने में ही विदेशी निवेशकों ने 12 अरब डॉलर से ज्यादा की भारतीय शेयरों में बिकवाली की है। इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता है। अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने भी बाजार का माहौल खराब किया है।
डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर
रुपये में गिरावट ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर किया है। डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के पार चला गया, जिससे आयात महंगा होने और महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। भारत का कच्चा तेल बास्केट 156 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की बात है।
महंगाई दर, जो पहले 2.2 प्रतिशत के आसपास थी, अब बढ़कर करीब 3.2 प्रतिशत हो गई है। आने वाले समय में ईंधन और खाद्य कीमतों के कारण इसमें और बढ़ोतरी का खतरा बना हुआ है।
शेयर बाजार में भी इसका असर साफ दिख रहा है। सेंसेक्स और निफ्टी में इस दौरान करीब 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि स्मॉल-कैप इंडेक्स अपने उच्च स्तर से करीब 22 प्रतिशत टूट चुका है। हालांकि, निफ्टी का वैल्यूएशन अब 17.3 गुना पर आ गया है, जो 10 साल के औसत 18.6 गुना से करीब 7 प्रतिशत कम है। दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर कुछ देशों की हिस्सेदारी बढ़ी है। चीन की हिस्सेदारी 9.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि जापान, हांगकांग, ताइवान और दक्षिण कोरिया ने भी अपनी स्थिति मजबूत की है। वहीं अमेरिका की हिस्सेदारी घटकर 46 प्रतिशत रह गई है।
कुल मिलाकर, भारत के शेयर बाजार पर इस समय वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के दबाव हैं, और आने वाले समय में स्थिरता के लिए कई चुनौतियों से गुजरना पड़ सकता है।
(प्रियंका कुमारी)










