Israel-Iran War impact: अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर संयुक्त हमला किया। इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया। सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। अगर यहां आवाजाही रुकी, तो भारत की करीब 50% मासिक कच्चे तेल की सप्लाई पर असर पड़ सकता।
डेटा एनालिटिक्स फर्म क्लेपेर के मुताबिक, जनवरी-फरवरी में भारत के कुल मासिक तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा होर्मुज के रास्ते आया। यह आंकड़ा नवंबर-दिसंबर 2025 में 40% था। अभी भारत रोज़ाना करीब 26 लाख बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से आयात कर रहा। यह तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है।
कच्चे तेल को लेकर भारत की परेशानी बढ़ सकती
क्लेपेर के एनालिस्ट सुमित रितोलिया के मुताबिक, अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है तो इसका तुरंत असर भारत और वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा। भारत की सप्लाई, फ्रेट कॉस्ट, बीमा और आयात बिल सब पर दबाव बढ़ेगा। ब्रेंट क्रूड के दाम भी भू-राजनीतिक जोखिम के चलते तेजी से ऊपर जा सकते।
भारत का तेल आयात का आधा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से आता
सूत्रों का कहना है कि अगर रास्ता बंद हुआ तो भारत सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (रेड सी की ओर) और यूएई की अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (फुजैरा तक) जैसे वैकल्पिक मार्गों का सहारा ले सकता है। लेकिन इन पाइपलाइनों की क्षमता सीमित है और इनका इस्तेमाल प्राथमिकता के आधार पर होता है। यानी वे पूरी कमी नहीं भर पाएंगी।
पिछले दो महीनों में भारत ने मध्य-पूर्व से आयात बढ़ाया है। फरवरी (अब तक) में कुल आयात 54.7 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो जनवरी में 51.4 लाख बैरल प्रतिदिन था। रूस से आयात फरवरी में 11.5 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो जनवरी में 10.9 लाख था। वहीं इराक से आयात घटकर 9.42 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि सऊदी अरब से आपूर्ति बढ़कर 11.1 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गई।
अगर होर्मुज में रुकावट आती है तो भारत को दोबारा रूसी तेल की ओर झुकना पड़ सकता है, जबकि रूस पहले से पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे में है। अमेरिका ने पिछले साल रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए थे। हाल ही में अमेरिका-भारत समझौते के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारत रूसी तेल खरीद बंद करेगा।
विकल्प के तौर पर भारत रूस (पूर्वी मार्गों से), अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) और लैटिन अमेरिका (ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला) से आयात बढ़ा सकता है। लेकिन इन देशों से तेल लाने में दूरी ज्यादा है, जिससे फ्रेट लागत बढ़ेगी और आयात महंगा होगा।
होर्मुज की खाड़ी से सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि भारत के रिफाइंड प्रोडक्ट का निर्यात भी जुड़ा है। इस साल अब तक भारत ने 74,000 बैरल प्रतिदिन रिफाइंड उत्पाद इसी रास्ते से निर्यात किए हैं। अगर रुकावट आई तो यूरोप, अफ्रीका या एशिया-प्रशांत की ओर माल मोड़ना पड़ेगा, जिससे शिपिंग समय और लागत दोनों बढ़ेंगे।
आईसीआरए के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ के मुताबिक, दुनिया की करीब 20% तेल खपत होरमुज़ से गुजरती है। इसलिए अगर यहां संकट गहराया तो असर सिर्फ भारत ही नहीं, पूरे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा।
(प्रियंका कुमारी)










