इंदौर में पटवारी भर्ती से जुड़े बहुचर्चित फर्जीवाड़ा मामले में लंबा इंतजार खत्म हो गया है। करीब 13 साल बाद कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए गए।

इंदौर। करीब डेढ़ दशक पुराने पटवारी भर्ती से जुड़े एक मामले में आखिरकार अदालत ने  फैसला सुना दिया। जिला न्यायालय ने विजयनगर निवासी महेश मकवाना को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।

2008 भर्ती परीक्षा से जुड़ा मामला 
यह मामला वर्ष 2008 में आयोजित पटवारी चयन परीक्षा से संबंधित है, जिसे तत्कालीन व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्‍यापमं) द्वारा आयोजित किया गया था। परीक्षा में सफल होने के बाद महेश मकवाना का चयन हुआ और उन्हें आगे की प्रक्रिया के तहत प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था। शुरुआती दौर में चयन प्रक्रिया सामान्य रही, लेकिन बाद में दस्तावेजों की जांच के दौरान मामला संदेह के घेरे में आ गया।

फर्जी मार्कशीट का लगा आरोप 
जांच के दौरान यह आरोप सामने आया कि आरोपी द्वारा प्रस्तुत बीसीए की मार्कशीट, जो उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय से संबंधित बताई गई थी, संदिग्ध है। अधिकारियों को आशंका थी कि यह दस्तावेज फर्जी हो सकता है। इसी आधार पर मामले की जांच शुरू हुई और प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

लंबे समय कोर्ट में चला मामला 
इस मामले की शुरुआत 1 दिसंबर 2010 को हुई, जब कलेक्टर कार्यालय की भू-अभिलेख शाखा ने शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद लगभग डेढ़ साल बाद, 1 फरवरी 2012 को रावजी बाजार थाने में औपचारिक एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद जून 2013 में अदालत में चालान पेश किया गया, जिसके बाद से मामला न्यायालय में विचाराधीन रहा।

अभियोजन की कमजोर दलीलें 
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए या उनका उपयोग किया। बचाव पक्ष के वकील ललित काला ने तर्क दिया कि आरोप केवल संदेह के आधार पर लगाए गए हैं और उनके समर्थन में कोई ठोस प्रमाण नहीं है। अदालत ने भी इस बात को स्वीकार किया कि साक्ष्यों की कमी के कारण आरोपों को प्रमाणित नहीं किया जा सकता।