Story OF Delhi: दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह नाम शहर की प्राचीन पहचान को दर्शाता है। सांसद ने पुरातत्व सर्वे ऑफ इंडिया की खुदाई का हवाला दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि दिल्ली का वर्तमान नाम मध्यकालीन है और प्राचीन इतिहास से जुड़ा नहीं। इंद्रप्रस्थ नाम महाभारत काल से जुड़ा है। यह बदलाव शहर की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करेगा। सांसद की यह मांग राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस को जन्म दे रही है। लोग अब दिल्ली के पुराने नाम पर चर्चा कर रहे हैं। यह प्रस्ताव शहरवासियों में उत्सुकता पैदा कर रहा है।
पांडवों के समय के इंद्रप्रस्थ को आज की दिल्ली का प्राचीन रूप माना जाता है। मुगलों ने यहां अपना पहला शहर बसाया था। दिल्ली की कहानी बेहद दिलचस्प है, जो दिलवालों की इस नगरी को और भी खास बनाती है। हाल ही में केरल का नाम केरलम करने के बाद अब दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने की मांग जोर पकड़ रही है। यमुना नदी के किनारे बसा यह शहर अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है। पांडवों के इंद्रप्रस्थ से लेकर मुगलों के बसाए शहर तक, दिल्ली बनने की पूरी कहानी जानना रोचक है। यह शहर विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं का संगम है। यहां की हर गली इतिहास की दास्तां सुनाती है। दिल्ली ने कई युग देखे हैं, जहां राजा-महाराजा आए और गए। इसकी जमीन में दफ्न हैं अनगिनत कहानियां। नाम बदलने की मांग से पुरानी यादें ताजा हो रही हैं।
पुराने किले में खुदाई से मिले प्रमाण
पुरातत्व सर्वे ऑफ इंडिया ने पुराने किले में खुदाई की, जहां लगभग 1000 ईसा पूर्व के प्राचीन बसावट के सबूत मिले हैं। इनमें पेंटेड ग्रे वेयर संस्कृति के अवशेष शामिल हैं, जिन्हें महाभारत काल से जोड़ा जाता है। ये खोजें इस धारणा को मजबूत करती हैं कि प्राचीन इंद्रप्रस्थ इसी जगह पर था, जहां आज दिल्ली है। खुदाई से मिले प्रमाण शहर के प्राचीन इतिहास की पुष्टि करते हैं। यह दर्शाता है कि दिल्ली की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये अवशेष महाभारत की कथाओं से मेल खाते हैं। यह खोज दिल्ली की ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाती है। लोग अब इन प्रमाणों पर गौर कर रहे हैं। नाम बदलने की मांग को इससे बल मिला है।
दिल्ली नाम की मध्यकालीन उत्पत्ति
खंडेलवाल ने कहा कि 'दिल्ली' नाम अपेक्षाकृत बाद के मध्यकालीन दौर में प्रचलन में आया। इतिहासकार इसे ढिल्लिका या देहली जैसे नामों से जोड़ते हैं। लेकिन यह नाम शहर की मूल और प्राचीन सभ्यतागत पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं करता। प्राचीन काल में इसे इंद्रप्रस्थ कहा जाता था। मध्यकाल में नाम बदलने से पुरानी पहचान धुंधली हो गई। सांसद का मानना है कि इंद्रप्रस्थ नाम वापस लाने से इतिहास जुड़ेगा। दिल्ली का वर्तमान नाम विदेशी प्रभाव से आया माना जाता है। प्राचीन नाम से शहर की सांस्कृतिक जड़ें मजबूत होंगी। यह बदलाव ऐतिहासिक न्याय होगा।
दिलवालों की नगरी
दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यह दिलवालों की है। यह सच भी है, क्योंकि देश की राजधानी हर राज्य के लोगों और उनकी संस्कृति को अपने में समेटे हुए है। यहां विविधता का अनोखा मेल है। दिल्ली के हर कोने में अलग-अलग संस्कृतियां नजर आती हैं। यह शहर सबको अपनाता है। दिलवालों की दिल्ली में लोग खुलकर जीते हैं। यहां की सड़कें, बाजार और स्मारक विविधता की कहानी कहते हैं। राजधानी होने से यह और भी खास है। दिल्ली ने पूरे देश को एकजुट किया है।
दर्दनाक इतिहास
दिल्ली का इतिहास अगर देखें तो यह विदेशी आक्रांताओं की लूट-खसोट का गवाह रहा है। सड़कों पर कत्लेआम और सत्ता के लिए हत्याएं हुईं। दिल्ली की जमीन ने खून की नदियां देखी हैं। हर परत खोलने पर विस्तृत इतिहास सामने आता है। यहां की कहानियां दर्द और संघर्ष से भरी हैं। आक्रांताओं ने शहर को बार-बार लूटा। सत्ता के खेल में निर्दोष मारे गए। दिल्ली ने क्रूरता की चरम सीमा देखी है। इसका इतिहास हिंसा से अटा पड़ा है। फिर भी शहर उठ खड़ा हुआ। यह दर्शाता है दिल्ली कितनी मजबूती है। लोग अब भी इसके इतिहास से सीखते हैं।
कई शासकों का शासन
दिल्ली पर कई शासकों ने शासन किया, जिनकी अलग-अलग सभ्यताएं थीं। हर शासक का शासन खत्म होता गया और उनकी संस्कृति दिल्ली की जमीन में दफन हो गई। यहां लोदी, तुगलक, मुगल जैसे कई वंश आए। प्रत्येक ने अपनी छाप छोड़ी। दिल्ली ने विभिन्न युग देखे। शासकों की सभ्यताएं मिश्रित हो गईं। शहर की वास्तुकला में यह नजर भी आता है। किले, मस्जिदें और मंदिर इतिहास की गवाही देते हैं। हर दौर में दिल्ली बदली। लेकिन इसकी आत्मा वही रही। शासकों के आने-जाने से शहर समृद्ध हुआ। आज दिल्ली उन सभ्यताओं का संग्रह है।
महाभारत कालीन इंद्रप्रस्थ की स्थापना
दिल्ली का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। यमुना नदी के किनारे स्थित दिल्ली का प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ था। पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के सहयोग से खांडवप्रस्थ नामक स्थान पर इसका निर्माण करवाया। मुख्य वास्तुकार देवशिल्पी विश्वकर्मा और मयासुर थे। महाभारत में यह पांडवों की भव्य राजधानी बताई गई है। खांडवप्रस्थ बंजर था, लेकिन इसे दिव्य और आधुनिक शहर बनाया गया। पांडवों ने इसका नाम इंद्रप्रस्थ रखा। यह शहर वैभव का प्रतीक था। महाभारत की कथाएं इससे जुड़ी हैं। इंद्रप्रस्थ ने पांडवों के वैभव को दर्शाया। आज भी इसकी यादें बाकी हैं।
विश्वकर्मा और मयासुर की भूमिका
इंद्र के कहने पर विश्वकर्मा ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया। मयासुर ने इसमें एक विशेष सभा बनाई, जिसे 'मयासभा' कहा जाता है। विश्वकर्मा देवशिल्पी थे, उन्होंने शहर को भव्य रूप दिया। मयासुर ने अपनी कला से सभा को अनोखा बनाया। यह सभा भ्रम पैदा करने वाली थी। इंद्रप्रस्थ को दिव्य नगर बनाया गया। पांडवों की राजधानी में यह सभा प्रसिद्ध थी। निर्माण में देवी शक्तियां जुड़ी थीं। विश्वकर्मा ने इंद्र की आज्ञा से काम किया। मयासुर की मदद से शहर पूर्ण हुआ। यह निर्माण महाभारत की महत्वपूर्ण घटना है। इंद्रप्रस्थ की भव्यता आज भी कथाओं में जीवित है।