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Salary vs Saving: सैलरी बंद होते ही अकाउंट सेविंग अकाउंट में बदल सकता। इसके बाद मिनिमम बैलेंस और अलग-अलग चार्ज लागू हो जाते हैं। समय पर नियम चेक नहीं किए तो अनावश्यक फीस भरनी पड़ सकती है।

Salary vs Saving: अगर आपकी सैलरी किसी खाते में आना बंद हो गई, तो सावधान हो जाइए। कुछ ही महीनों में आपका सैलरी अकाउंट अपने आप सामान्य सेविंग अकाउंट में बदल सकता। पहली नजर में आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता दिखेगा, आपका डेबिट कार्ड चलेगा, यूपीआई भी एक्टिव रहेगा और नेट बैंकिंग भी पहले जैसी ही दिखेगी। लेकिन असली बदलाव पीछे से शुरू हो जाते, जहां नए नियम और चार्ज लागू हो जाते ।

सबसे बड़ा बदलाव मिनिमम बैलेंस को लेकर होता। सैलरी अकाउंट आमतौर पर जीरो बैलेंस पर चलता है क्योंकि कंपनी और बैंक के बीच समझौता होता है। लेकिन जैसे ही सैलरी आना बंद होती है, बैंक एक तय औसत मासिक बैलेंस रखने की शर्त लागू कर देता।

सेविंग अकाउंट में मिनिमम बैलेंस रखना जरूरी
यह रकम शहर और बैंक के हिसाब से कुछ हजार रुपये तक हो सकती है। अगर बैलेंस कम हुआ तो हर महीने पेनल्टी कट सकती, जो धीरे-धीरे खाते की रकम को कम कर देती।

मुफ्त सुविधाओं पर भी चार्ज लगना चालू हो सकता
इसके अलावा, जो सुविधाएं पहले मुफ्त थीं, उन पर अब चार्ज लग सकता। जैसे डेबिट कार्ड का सालाना शुल्क, SMS अलर्ट फीस, चेकबुक, फिजिकल स्टेटमेंट और ब्रांच में जाकर किए गए ट्रांजैक्शन पर भी पैसे लग सकते । अगर आप अकाउंट का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते, तब भी ये चार्ज लगते रहेंगे, जो परेशानी का कारण बन सकते हैं।

ट्रांजैक्शन के नियम भी बदल जाते हैं
ट्रांजैक्शन से जुड़े नियम भी बदल जाते हैं। सेविंग अकाउंट में हर महीने एटीएम से मुफ्त निकासी की एक लिमिट होती है। इसके बाद हर ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगता है। वहीं, नॉन-होम ब्रांच से ट्रांजैक्शन करने पर भी अतिरिक्त चार्ज देना पड़ सकता है। अगर आप पहले की तरह ही बिना ध्यान दिए अकाउंट इस्तेमाल करते रहे, तो आपको बार-बार फीस देनी पड़ सकती है।

ब्याज दरों में ज्यादा बदलाव नहीं होता, लेकिन सैलरी अकाउंट के साथ मिलने वाले फायदे खत्म हो जाते हैं। जैसे कम ब्याज पर लोन, ज्यादा ट्रांजैक्शन लिमिट या अन्य ऑफर। अगर आपके खाते में ज्यादा पैसा रहता है, तो ये बदलाव आपको ज्यादा महसूस होगा।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आपके ऑटो-डेबिट जैसे EMI, इंश्योरेंस प्रीमियम, SIP या सब्सक्रिप्शन बंद नहीं होंगे। ये चलते रहेंगे। लेकिन अगर नए नियमों की वजह से बैलेंस कम हुआ, तो पेमेंट फेल हो सकते हैं, जिससे पेनल्टी और लेट फीस का खतरा बढ़ जाता है।

ऐसी स्थिति से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि आप तुरंत अपने बैंक की वेबसाइट या मोबाइल ऐप पर जाकर यह चेक करें कि आपका अकाउंट अब किस कैटेगरी में है। मिनिमम बैलेंस और चार्ज हर बैंक और शहर में अलग-अलग होते हैं। सही जानकारी होने पर आप तय कर सकते हैं कि अकाउंट जारी रखना है या बंद करना बेहतर रहेगा।

(प्रियंका कुमारी)

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