सचिन अग्रहरि- राजनांदगांव। शांति कोई उपहार नहीं है, यह एक आहुति है। छत्तीसगढ़ की माटी आज अगर लाल आतंक से मुक्ति की यह पर है तो उसके लिए बलिदान देने वालों की लंबी फेहरिस्त है। बस्तर से सरगुजा और राजनांदगांव तक कभी छत्तीसगढ़ की रक्तिम पहचान बना माओवादी विचार अब आखिरी सांस ले रहा है। यह वक्त उन शहीदों को नमन करने का है, जिन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया ताकि हम यह दिन देख सकें। हरिभूमि में आज से नक्सलवाद का दंश झेल चुके हर्र जिले की कहानी।
उन शहीदों के नाए जिनकी शहदात ने हमें आतंक से मुक्ति दिलाई। पहली कहानी राजनांदगांव के उन शहीदों की जिन्होंने मानपुर की गलियों जंगलों में अपना 'आज' हमारे 'कक्ष फालए न्योछावर कर दिया। 2009 में मदनवाड़ा के जंगलों में एसपी वी. के. चौबे सहित 29 जांबाजों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा में प्राणों की आहुति दी, तो उस शहादत ने पूरे तंत्र को झकझोर कर रख दिया।
राजनांदगांव का 'नक्सल-मुक्त' होना उन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि
31 मार्च की समय सीमा के साथ छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के खात्मे की दहलीज पर खड़ा है, तो राजनांदगांव का 'नक्सल-मुक्त' होना उन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है। इतिहास पर गौर करें तो नक्सल संगठनों ने 1990 में पहली बार खैरागढ़ के बकरकट्टर में एक रेंजर की पिटाई कर अपनी उपस्थिति का अहसास कराया था। साल-दर-साल नक्सलियों ने गांव-गांव में अपना नेटवर्क तैयार कर 1996 में मानपुर थाना को लूटकर पूरे प्रदेश में दहशत फैला दी। अविभाजित राजनांदगांव जिले में एसपी व्हीके चौबे सहित 28 जवानों की शहादत के बाद पुलिस और केंद्रीय फोर्स ने निर्णायक जंग 'का ऐलान कर कई नक्सलियों को मार गिराया।
बीहड़ जंगल में 29 कैंप के जरिये घेराबंदी
राज्य गठन के बाद नक्सलियों की घेराबंदी करने के लिए अविभाजित राजनांदगांव जिले में 29 कैंप खोले गए। जंगल में खोले गए इस कैंप के जरिये लगातार ऑपरेशन भी लांच किया गया। खैरागढ़ जिले में बगारझोला, घोटा, भावे, मलैदा, बुढ़ानमाठ, मोहगांव, घाघरा, महुआढार, कटेमा, कौरवा, राजनांदगांव जिले के कन्हारगांव, कोठीटोला, जोब, मोहारा, मोहला जिले में पाटनखास, चिल्हाटी, परेवाडीह, पानाबरस, पल्लेमाड़ी, गोटाटोला, जक्के, बसेली, कोहका, संबलपुर, पीटेमेटा, सीतागांव, मदनवाड़ा, डोमीकला और नवागांव में पुलिस और फोर्स ने तगड़ी मोर्चाबंदी की।
2006 में केंद्रीय फोर्स ने संभाली कमान
नक्सलियों की घेराबंदी करने के लिए सन् 2006 में राजनांदगांव जिले में केंद्रीय फोर्स सीआरपीएफ की तैनाती की गई। तीन साल बाद जिले में आईटीबीपी फोर्स के जवानों ने मोर्चा संभाला। पुलिस और फोर्स ने नक्सलियों को मार गिराने में सफलता भी हासिल की। वहीं लगातार ऑपरेशन के बीच 50 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी कर दिया।
एसपी चौबे समेत 28 की शहादत के बाद आर-पार की जंग
सन 2009 में एसपी व्हीके चौबे सहित 28 जवानों की शहादत के बाद पुलिस और फोर्स ने जिले में आर-पार की जंग का ऐलान किया। जिले में पुलिस कैंप स्थापित कर जहां लगातार ऑपरेशन लांच किए गए। वहीं कई नक्सलियों को मार गिराने में भी सफलता हासिल हुई। लगातार जंग के बीच भी नक्सलियों ने 2015 में कवर्धा जिले में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया था। पुलिस और केंद्रीय फोर्स की तैनाती के बाद पिछले कुछ सालों से नक्सली संगठन बैकफुट पर चले गए थे। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने पिछले साल राजनांदगांव, कवर्धा और खैरागढ़-मोहला-मानपुर जिले को नक्सल मुक्त होने की घोषणा की थी। मोहला-मानपुर-चौकी जिले में पिछले एक साल से, एक दलम सक्रिय था। इस दलम ने भी पिछले दो दिन पहले आत्मसमर्पण कर अविभाजित जिले को नक्सल मुक्त कर दिया है।