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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच राजनीतिक दलों द्वारा बड़े पैमाने पर वित्तीय वादे किए जा रहे हैं। कहीं मासिक सहायता योजनाएं घोषित की जा रही हैं, तो कहीं एकमुश्त नकद देने के वादे मतदाताओं को आकर्षित करने का केंद्र बन गए हैं।

इन योजनाओं को लेकर सियासी बहस तेज है। एक तरफ इन्हें सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी नीति बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ आलोचक इसे ‘रेवड़ी कल्चर’ कहकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बता रहे हैं।

बढ़ते सरकारी कर्ज और खर्च के बीच यह सवाल और अहम हो गया है कि क्या इस तरह की योजनाएं दीर्घकाल में आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है-
क्या चुनावी ‘फ्री योजनाएं’ जनता की मदद हैं या देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ?

इसी मुद्दे पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ विशेष चर्चा में विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों ने अपनी राय रखी।

Debate Panel

  • रत्नाकर सिंह – प्रवक्ता, भाजपा
  • संजय चक्रवर्ती – प्रवक्ता, टीएमसी
  • संजीव कौशिक – राजनीतिक विश्लेषक
  • डॉ. अजय उपाध्याय – प्रवक्ता, कांग्रेस

चुनावी ‘रेवड़ी’ पर किसने क्या कहा? ऊपर गए वीडियो में देखें पूरी चर्चा

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